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"अयं निज : परोवेति गणना लघु चेतसाम् । उदार चरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम॥"

31 मई 2010

उम्मीद


Blogvani.com
चिथडों में किसी तरह अपना तन छुपाये 11 वर्षीय राजू सेठ दीनदयाल के यहाँ जूठे बर्तन साफ कर रहा था.वह दो वर्षों से दीनदयाल जी के यहाँ काम कर रहा था.दीपावली नजदीक आ रही थी और उसके पास बेहतर कपडे नहीं थे.

सहसा उसे सेठ जी के बेटे निसर्ग की आवाज सुनायी दी,जो उसका हमउम्र था. निसर्ग धोबी को डांट रहा था जिसकी गलती से उसकी नई शर्ट की बांह जल गई थी.उसकी डांट-फटकार सुनकर राजू की आँखे खुशी से चमक उठी.उसे उम्मीद थी अब वह शर्ट उसे मिल जाएगी और उसे इन चिथडों में दीपावली नहीं मनानी पडेगी.

6 टिप्‍पणियां:

  1. इतने कम शब्दों में इतनी प्रभावशाली रचना बहुत कम देखने को मिलती है
    इस रचना के लिए धन्यवाद

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  2. gazab ki umid magar ha saho kaha he kisi ne


    "umid par sari dunia tiki he "

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  3. मेरे ब्लोग मे आपका स्वागत है
    क्या गरीब अब अपनी बेटी की शादी कर पायेगा ....!
    http://sanjaybhaskar.blogspot.com/2010/05/blog-post_6458.html
    आप अपनी अनमोल प्रतिक्रियाओं से  प्रोत्‍साहित कर हौसला बढाईयेगा
    सादर ।

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  4. बढ़िया प्रस्तुति पर हार्दिक बधाई.
    ढेर सारी शुभकामनायें.

    संजय कुमार
    हरियाणा
    http://sanjaybhaskar.blogspot.com

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  5. कितना कड़वा सच है.....उम्मीद की जाली हुई शर्ट तो कम से कम मिल जायेगी

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